कुछ चक्रव्यूह, कुछ प्रतिव्यूह, जिसपर है एक व्योमव्यूह, जल षडयंत्रो की चिंगारी से। वह वर्षो से पुकार रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। जो सिंघासन को ठुकरा कर, वन-वलकल को अपनाकर, त्यागी-तपस्वी मर्यादापुरुषोत्तम। सत्ताओं के बीच कराह रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। जो खुद में राजाओं का राजा, करुण ह्रदय का जो महाराजा, तुलसी,कबीर का जो स्वामी। वह पनाह मांग रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। जिसने पत्थर से अहिल्या बनाया, जूठा बेर सबरी का खाया, केवट से पग धुलवाने वाला। किसी और का राह ताक रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। कपि,रीछ है जिसके सेवक, जो समूचे ब्रम्हांड का खेवक, रघुकुल शिरोमणि पालनहार। वह इंसाफ मांग रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। प्रचंड विद्वान,त्रिकालदर्शी, महाबली रावण को मारा, लक्ष्मण जैसा भाई जिसका। वह पंडाल में जीवन काट रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। लोकतंत्र में कानूनों के बीच, चंद दलों और दलालों के बीच, अयोध्या में जनमने वाला। अदालतों का चक्कर काट रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। हिन्दू-मुश्लिम के चक्कर मे, मंदिर मस्जिद के चक्कर मे, सबको सबकुछ देने वाला। सरकारों के घर में झाँक रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।। न्यायाधीशो का जो न्यायधीश, बरसाता जो सबपर आशीष, न्यायालय में खुद न्यायाधीन। फिर भी अपना घर मांग रहा है, क्या? मेरा राम हार रहा है।।