
कलम की रफ़्तार जिंदगी का सफ़र है।
ख़त्म पड़ी स्याही का किसको फिकर है।।
जब तक चले,तभी तक वो साथ रहती है,
रुकने के बाद किसको किसकी ख़बर है।
समय के चाल से चलने के लिए डगर है।
ठहरा हुआ वक्त,अस्तित्व का कहर है।
लिखतें-मिटाते,जैसे-तैसे नही रह सकते,
ये पेंसिल का नही बल्कि कलम का शहर है।।
अजीबों के बस्ती में,एक अजूबा पहर है।
अंधेरे ख्याल
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