कभी तो मेरे गली से गुजर, ऐ! रहनुमा राहगुज़र। इबादतों में मैं माँगता रहा और तू चली गैरो के घर।। चल माना तेरी आरजू खातिर,चहिए  होगी मुकद्दर। पर ख़्वाहिश होती है सबकी,कि हो वह सिकंदर।। तू इश्क,मंजिल,हुस्न या खज़ाना नही हो सकती। तू मुद्दत,मुद्दई,मुस्तफा या ज़माना नही हो सकती।। तू जो भी हो, पर इतनी अश्क़िया नही हो सकती। तेरा होना जश्न है,तू इतनी घठिया नही हो सकती।। क्योचाहे तुझे कोई सख़्त,इसके लिए कोई अता नही। हर इन्सां अजीज होना चाहता,ये उसकी ख़ता नही।। तू जलसा है,उम्मीद है, सभी की आखिरी कमाई है। ऐ! इंसानियत,तेरा पता किसी को पता क्यो नही??