रूप........


रूप में मधुबाला सी हो,

नशे में मधुशाला सी हो।।

प्रेम कहानियों की गंतव्य हो तुम,

सुंदर,सहज,भव्य हो तुम।।

साँचे में ढाला आकर हो तुम,

किसी शायर का सपना साकार हो तुम।।

वीणा की मधुर झनकार हो तुम,

सुरों की सर्वोच्च फ़नकार हो तुम।।

मेरे हृदय की रानी हो तुम,

मुझ मूक की वाणी हो तुम।।

मेरे कृष्ण का मोर पंख हो तुम,

मधुसूदन का पंचजन्य शंख हो तुम।।

समझूँ तो निरर्थ हो तुम,

पर मेरी कविता का अर्थ हो तुम।।


 

    तुम कोई और नहीं मेरी वह कल्पना हो,

जो कभी साकार नहीं हो सकीं।।

                 

                 ....सत्यम