नींद ने, यूँ नींद न, आने पर पूंछा रात में,
नेत्र के इन मोतियों को फेंकते क्यो रात में।
क्या हुआ जो बह चले ये धार बिन बरसात में,
बात उनसे हो गयी क्या ख्वाब की मुलाकात में।।
था निरुत्तर मैं यूँ ही सपनो की आधी रात में,
दिल की उठती बादली और उस घनेरी रात में।
लग रहा था भीग मैं फिरसे गया बरसात मे,
गलती बस ये थी के डूबा उसके मैं खयालात में।।
नींद बोली क्रुद्ध होकर जानने के आस में,
गर तुम इतना प्यार करते रखते हो यूँ पास में।
और उसको ही बसा रखा है यू एहसास में,
फिर क्यो बैठे दूर इतना हो विरह के पाश मे।।
मैंने बोला सर झुकाकर यूँ ही मैं डरता नहीं,
बूँद की इक आस में चातक यूँ ही मरता नहीं।
राधिका से प्रेम पर यूँ प्रश्न क्यूँ करता नहीं,
और राधा के विरह में कृष्ण भी मरता नहीं।।
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