माँ के पाँव
गाँव की सब खुशबुवों की छाँव भुला आया हूँ।
मैं ही था अभागा माँ के पाँव भुला आया हूँ।।
सपनों के भरम में जैसे गाँव भी शहर हुए।
फिर उलझ गई है नाव शांत जल भँवर हुए।।
भँवर से निकलने का हर दाँव भुला आया हूँ।
मैं ही था अभागा माँ के पाँव भुला आया हूँ।।
निकले थे घर से हम लक्ष्य एक साधकर।
चढ़ेंगे ऊंचाइयां कुछ कर्मफल को बांधकर।।
अब इन्हीं ऊंचाइयों में छाँव भुला आया हूँ।
मैं ही था अभागा माँ के पाँव भुला आया हूँ।।
संग में हो राम तो फिर स्वर्ण हिरन चाहिए।
किन्तु स्वर्ण नगरी में भी रघुनन्दन चाहिए।।
स्वर्ण लंका में कुटी की छाँव भुला आया हूँ।
मैं ही था अभागा माँ का पाँव भुला आया हूँ।।
थोड़े ही दिनों तलक ये पैसों के भरम रहे।
और उसके बाद न पैसे रहे न हम रहे।।
पैसों की चमक में अपना गाँव भुला आया हूँ।
मैं ही था अभागा माँ का पाँव भुला आया हूँ।।
@SatyaSurendraM #सत्यसुरेन्द्र

