किसान

इस धरा पर विधाता का वरदान हूँ,

कर्मयोगी के कर्मों का पहचान हूँ,

लूटकर जो दलालों में बांटा गया,

भारती माँ की बस वो मैं सन्तान हूँ!

हाँ मैं किसान हूँ! हाँ मैं किसान हूँ!

हाँ मैं किसान हूँ! हाँ मैं किसान हूँ!


खून से इस धरा को किया है हरा,

पूरे दुनिया का है पेट हमने भरा,

खुद पसीना बहाया पर हारे नहीं,

हक कभी भी किसी का हैं मारे नहीं,

न बिका जो कभी वो मैं ईमान हूँ!

हाँ मैं किसान हूँ! हाँ मैं किसान हूँ!


करके अरबों गबन हैं वो विदेश में,

लाठियां हम पे बरसे यहां देश में,

 ठंढ़ से रूह कंपती घरों में भी जब,

द्वार आएं हैं हम रहबरों के भी तब,

ठंढे जल, अश्रु गोले का मेहमान हूँ!

हाँ मैं किसान हूँ! हाँ मैं किसान हूँ!


घिस के पत्थर भी हीरा बनाते हैं हम,

बीज से इक, जखीरा बनाते हैं हम,

माथ के हर पसीने से सींचा इसे,

खाद डाली लहू की फिर मींचा इसे,

खेत के हर अनाजों का सम्मान हूँ!

हाँ मैं किसान हूँ! हाँ मैं किसान हूँ!


रहबरों, रहनुमा मेरे सरकार सुन,

वक्त की भी यही है ये दरकार सुन,

अन्नदाता पर लाठी जब चल जाती है,

देवताओं की सत्ता भी हिल जाती है,

क्रान्ति का भी जनक, विनाशी तूफान हूँ!

हाँ मैं किसान हूँ! हाँ मैं किसान हूँ!

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