बेटियाँ
पेट में माँ के ले जन्नत के फूल सोई थी।
जन्मे भगवन यहीं बस इसी में खोई थी।।
जन्म लेते ही मेरा सारा भरम टूट गया।
नाम बेटी का सुनके बाप का दिल रूठ गया।।
सभी थे दे रहे बधाई लक्ष्मी आई है।
और मैं थी चकित कि क्यों उदासी छाई है।।
बात बीती समय के साथ मैं भी बढ़ आई।
कई जगत में किया टॉप आगे चढ़ आई।।
मेरी भी उम्र बस सबकी तरह थी बढ़ने लगी।
सपनों को मन में सजा हर ऊँचाई चढ़ने लगी।।
धीरे-धीरे सबके निगाहों की हया जाने लगी।
कसते फब्तियां जब पढ़के घरको आने लगी।।
फिर एक रोज निर्भया भी नोच खाई गई।
करके निर्वस्त्र वो दिल्ली में भी दिखाई गई।।
पूरा समाज था गुस्से में शर्मसार भी था।
दफन होंगे सभी नामर्दों ये आसार भी था।।
फिर अपनी आबरू और इस समाज के डर से।
मेरा रिस्ता किया पिता ने एक लोभी नर से।।
उसने दहेज में माँगी वो सारी दौलत थी।
उसकी समाज मे जाने न कैसी शोहरत थी।।
मेरे मां-बाप की सारी वो दौलत छूट गयी।
गयी न बेटी संग में सारी रौनक लूट गयी।।
बेटियां बस क्या गुनाह होती है।
गरीबों के दिलों की केवल आह होती हैं।।
कुछ प्रश्न समाज से :-
कैसे सूनी कलाई पर बंधी राखी होगी।
गर बेटी सड़क पर जलके यूँ राखी होगी।।
शादी के सात फेरों को भी तरस जावोगे।
जब बिन दहेज तेल छिड़ककर जलावोगे।।
मात दुर्गे भी क्रुद्ध कालिका बन जाएंगीं।
बिना कन्यावों के वो चण्डिका बन जाएंगीं।।
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