अंतिम सत्य
जीवन मे सब अनुबंधित है,
खुश रहना भी प्रतिबंधित है,
सबको कुछ खोने का गम है,
हर घर में देखो मातम है,
सब सपने लगते हैं फिजूल,
बस राहों में बिछ गये शूल,
आशाएं मरती रहती हैं,
निराशा से मौत भी डरती है,
इन सब बन्धन को तोड़-तोड़,
हर स्पंदन को जोड़-जोड़,
जो आगे बढ़ता जाता है,
बस वो मंजिल पा जाता है।
दुनिया में जब अंधियारा हो,
बस दुख की बहती धारा हो,
अमृत खुद विष से मर जाए,
औषधि रोग से डर जाए,
तब भी जो अपने सपनों में,
इस कुरुक्षेत्र के अपनों में,
गाण्डीव उठा भिड़ जाता है,
वह ही विजयी बन जाता है।
जो आगे बढ़ता जाता है,
बस वो मंजिल पा जाता है।।
जब देना होता अधिक प्यार,
ईश्वर देते हैं दुःख अपार,
थे युवराज भर रघुनन्दन,
चौदह वर्षों भटके वन-वन,
फिर वापस आये बन उत्तम,
कहलाये मर्यादा पुरुषोत्तम,
एक राजा राज पा जाता है,
बनवासी महान बन जाता है।
जो आगे बढ़ता जाता है
बस वो मंजिल पा जाता है।।
@SatyaSurendraM

