कब तक सहेंगे?
कब तक सहेंगे
अनिल तप कब तक जिएंगे
गिर-गिर गिरि अब सपूतों
की कफन को मांगता
गंगा लहू वाली रगों
पर क्यों तिरंगा बांधता
क्या चीर छाती की जुबानी
ओष्ठ स्वर कह पाएगा
क्या मान का भरमार देकर
प्रश्न से बच जाएगा
व्याकुल नयन के ओज
को कंधा कोई दे पाएगा
जब तक विकल्पों की जगह
केवल प्रलापों में रहेंगे
वीर खोने को तनिक भी
नीर अविरल सा कहेंगे
तब तक सहेंगे
खंडित हुई अवधारणाएँ
जिसने रची सीमा नयी
बारूद बंदूकों ने लिखी
महिमा अनूठी यह सदी
बलिदानी सैनिक को प्रिय
ये राष्ट्र का ही भाग्य है
किन्तु शहादत प्रायः हो
तो ये कहाँ का न्याय है?


