मेरे सब्र का इम्तिहान मौला ने कुछ यूँ लिया हैं जान भी ले ली हैं और जीने को छोड़ दिया हैं मोहताज तो हम अपनी साँसों के भी नहीं फिर उस खुदा के कैसे हो जिसने तन्हा कर दिया हैं बसती हैं तन्हाई आज उन रौनक भरी रातों में लगता हैं जैसे उजालो ने भी मुह मोड़ लिया हैं मधुशाला की चोखट पे लाके छोड़ा हैं जिंदगी ने मदिरा के समंदर के सरोबार कर दिया हैं काश कोई एक रंग छोड़ा होता वक़्त ने 'सतीश' हर एक रंग को अपने में मिलाकर स्याह कर दिया हैं !