सुबह उठा आज एक अधूरे ख्वाब से फिक्र लिए ,  कोई एग्जाम था सर  पर और मैं तैय्यार नहीं था ..  बाल्कनी तक पहुंचा जब आधी नींद मे, ख्वाब टूट चुका था .. फिक्र मिट चुकी थी  सूरज निकला न था पर  सुबह हो चुकी थी धीमे होते हुए साँसों मे  गुलमोहर की खुश्बू घुल रही थी ..  अप्रैल के महीने से दिल का  बचपन से रिश्ता रहा हैं ... आज भी लगता है जैसे  लंबी छुट्टियाँ पास ही हैं ...