महंगाई, महंगाई, महंगाई
लागत बा ई ससुरी कब्बो ना जाई
सुबह - शाम नून - तेल की जोगाड़ में
निकलत बा खटाई, महंगाई..महंगाई..महंगाई
खादी वाला नेता लूटलें;
चमचा और चेलन में बटलें,
हमरा नईखे बुझात ई देशवा कवना ओरे जाई;
महंगाई, महंगाई, महंगाई
लिखल पढल सब फेल हो गई ल
रोजी रोजगार अब सपना भईल
जी डी पी के केहू ना जानें
कइसे उ रसातल गईल;
बचल खुचल कोरोना के लफड़ा
सबकी नाक में दम कईले बा
डाक्टर, वैद्य, सब लगल पड़ल बा दीहला में नित नित काढ़ा और, दवाई
फिर भी भइया केहू ना जाने की
के जी ही के मर जाई
महंगाई, महंगाई, महंगाई,
लागत बा ई ससुरी कब्बो बा जाई।


