ऐसी तनहाई कि उफ अब सही नही जाती,
बिन तुम्हारे ये दाॅसता भी कही नही जाती।
दिन तो कट जाता है जहाँ की बातों में,
रात की खामोशी अब और सुनी नही जाती।
 बेबसी का ये आलम हैअब और क्या कहूॅ,
मिल कर फिर ये जुदाई  सही नही जाती।।

रचयिता
एस एन माथुर