नन्ही नन्ही सी ओस की बूँदें,
छितरायी हुयी हरी हरी घास पर,
और उन पर पड़त हुयी सूरज की किरणें,
ऐसा लगता है जैसे छोटे छोटे मोती बिखरें हों.
मोती, जो की ढेर सारे हैं,
छोटे छोटे से जो मिल के बड़ेमोती बन जाते हैं,
अपना अस्तित्व भूल के दुसरे मोती में समां जाते हैं,
और इसमें साथ मिलता है उन्हें उस घास का,'[
जो की उन्हें ऐसे संभाले रहती है जैसे की उसके छोटे छोटे बच्चे हों,
एक को दुसरे से मिलाती है अपने ऊपर से गुज़ा कर,
और जब ये बच्चे बड़ेहो जाते हैं,
और संभाले नहीं जाते हैं,
तो धीरे से उन्हें मिटटी पर और पत्थरों पर उतार देती है.
यहाँ से शुरू होती है उस ओस की दूसरी जिंदगी,
कभी वो धरती के छिद्रों में समां जाती है,
कभी वो कुछ पत्तों को नहलाती है,
कभी वो किसी जीव की प्यास बुझती है,
और कभी कभी वो ढलानों पर सरक जाती है.
और फिर होती है दिन की कड़ धूप,
जो इन बूंदों को अपने साथ उड़ाके ले जाती है,
और पीछे छोड जाती है वो सारे रास्ते जिनपर ये बूँदें चली थीं,
और वो घास जिसने इन्हे अपनाया था,
और इस प्रकृति की सारी चीजें जिन्हे इन बूंदों ने प्रभावित किया था.
लेकिन क्या उन बूंदों का जीवन इतना ही था?
क्या उनका अस्तित्व ख़त्महो गया?
क्या उनके लिए जिंदगी बस ये चाँद लम्हों की थी?
नहीं,
शायद नहीं,
वो बूँदें आज इसलिए नहीं हैं ताकि वो कल फिर से बरस सकें,
कल फिर से घास को भिगो सकें,
कल फिर से पत्तों को नहला सकें,
कल फिर किसी जीव की प्यास बुझा सकें,
क्यूंकि निरंतरता ही इस दुनिया का सत्य है.
विक्रम


