जीवन से भरा जीवन कैसे एक जीवन में ही हार गए,

हो वृथक जगत नियंता के तुम पर सारे उपहार गए ।

जब जन के नायक भी यूंही जीवन से आंख चुराएंगे,

तब अनुगामी उनके कैसे विध्नों से टकरा पाएंगे।



जगदीश्वर ने जो तुम्हें दिया वो कम कितना,या अधिक पड़ा,

जीवन का कौन धुंधलका,नायक की मशाल से रहा बड़ा?

जिस ईश्वर ने पथ पुष्प दिए, कांटे भी उसने ही डाले,

हे नायक तुमको चलना था,बिसरा पांवों के सब छाले।




जगदीश्वर शांति प्रदान करें,निज पुर इस दिव्य आत्मा को,

जो सबका प्यारा नायक था अब प्यारा वो परमात्मा को।

जीवन से जिसने सीख दिया, उसके मरने से भी सीखें,

शोहरत, संपत्ति कमायें पर सबसे पहले जीना सीखें


( सुशांत सिंह राजपूत को ईश्वर वैकुंठ वास दें)


-सर्वेश कुमार श्रीवास्तव