
पक्षीराज गरुड़ के अभिमान-मर्दन हेतु नीलगिरी वासी कागभुशुण्डि तथा माता पार्वती को भक्तिरसपान कराने हेतु भगवान शूलपाणि द्वारा वर्णित वृतांत जब छंद के मकरंद, रसों के सागर व अलंकारों के सुमन से मिलता है तो वह अमृत ही तुलसीकृत रामचरितमानस होता है।
शैव-वैष्णव एकत्व से यह समन्यव की चेष्टा बनता है,सीता
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