पक्षीराज गरुड़ के अभिमान-मर्दन हेतु नीलगिरी वासी कागभुशुण्डि तथा माता पार्वती को भक्तिरसपान कराने हेतु भगवान शूलपाणि द्वारा वर्णित वृतांत जब छंद के मकरंद, रसों के सागर व अलंकारों के सुमन से मिलता है तो वह अमृत ही तुलसीकृत रामचरितमानस होता है।

शैव-वैष्णव एकत्व से यह समन्यव की चेष्टा बनता है,सीता के होने से प्रेमकथा, रावण के होने से धर्मयुद्ध वृतांत, बजरंगी के होने से भक्तिकाव्य, आदर्शों के होने से मर्यादा पुरुषोत्तम की संकल्पना,औरबसे अहम राम के होने से रामकथा बनता है।

ऐसे महान मानस अमृत से खुद को वंचित रखने वाला महामूर्ख ही होगा।

-सर्वेश कुमार श्रीवास्तव