आज फिर से मैं प्रवासी हो रहा हूं

खोजने की जुगत में खुद खो रहा हूं


स्वप्न के तारे समेटें नील गगन से

फिर तेरे इस शहर में हम आगमन से

जिंदगी से दूर जीवन ढूंढते हैं

एक पराए शहर में घर ढूंढते हैं

सफलता की फसल कबसे काटने को

नीम के कुछ बीज फिर से बो रहा हूं


आज फिर से मैं प्रवासी हो रहा हूं

खोजने की जुगत में खुद खो रहा हूं


कर्म का कुरुक्षेत्र अपना जीतने को

कंकरीटों के वनों में घूमता हूं,

छोड़कर के गांव की मिट्टी की खुशबू

समरभूमि की रजों को चूमता हूं,

जन्मभूमि छोड़ना जीवन कमाना

पड़ेगा एक दिन स्वयं से दूर जाना

हाथ में कुछ लगी थी जो गीली मिट्टी

उसे सेनेटाइजर से धो रहा हूं


आज फिर से मैं प्रवासी हो रहा हूं

खोजने की जुगत में खुद खो रहा हूं


रोटियां दो जून के खातिर कमाने

मां के अंचारो का जादू खो रहा हूं,

ताकता नीला गगन ,गिनते सितारे

आंसुओं के बिना बैठे रो रहा हूं,

गांव की गलियां भुलाए ना भुलाती

बालपन की यादें अक्सर गुदगुदाती

बेफिक्री का दौर वो,अब खो रहा हूं


आज फिर से मैं प्रवासी हो रहा हूं

खोजने की जुगत में खुद खो रहा हूं