वतन की अपने कुछ खिदमत ओ चाकरी के लिए,
मुंतजिर कब से हैं इक अदद नौकरी के लिए,
चांद सूरज सितारे साथ रख लें,
तरसते रहते हैं कुछ ऐसी टोकरी के लिए।
सर्वेश कुमार श्रीवास्तव


वतन की अपने कुछ खिदमत ओ चाकरी के लिए,
मुंतजिर कब से हैं इक अदद नौकरी के लिए,
चांद सूरज सितारे साथ रख लें,
तरसते रहते हैं कुछ ऐसी टोकरी के लिए।
सर्वेश कुमार श्रीवास्तव