बेंचने खुद को चलें फिर, एक दिन जीवन मिले फिर


एक चौराहा जहां इंसान की मंडी लगी थी

सिमटते कुरते फटे, दिन रात सी ठंडी लगी थी,

वो खड़े निज स्वेद से दो जून की रोटी कमाने

किसी घर की नींव रखने, किसी पर रंगत चढ़ाने,

लेबरों की भीड़ में ज्यादा थे नरकंकाल जैसे

फिर भी हंसते, कूदते,लगते वो मालामाल जैसे,

देखते टकटकी भरके कोई आए ले चले फिर


बेंचने खुद को चलें फिर, एक दिन जीवन मिले फिर


उन मलीनों को निरख, संभ्रांत नाकों को दबाए

बोलते थे जानवर जाने कहां से चले आए

महकते महलों के बाशिंदे,वो,मूरख भूल बैठे,

है किसी मजदूर का ही स्वेद उनके भी घरों में

देव हैं निर्माण के जो ना उन्हें हम हेय समझें,

विश्वकर्मा स्वयं बसते आज भी उनके करों में

मुस्कुराती गरीबी और नाक-भौं सिकुड़ी अमीरी,

विरोधाभासी नजारे देखकर हम मुड़ चले फिर


बेंचने खुद को चलें फिर, एक दिन जीवन मिले फिर


आश में आए इसी फिर,स्वप्न लेकर इस शहर को

हांथ में छीनी-हथौडी राह तकती आंख घर को

स्वांस और प्रस्वांस बस ये ही तो है जीवन हमारा

न तो कुछ भी जीत पाए,न ही जीवन में कुछ हारा

पीढ़ियां अगली पढ़ें और ना करें वो भी मजदूरी

झेल ली हमने बहुत पर, रहे ना उनको मजबूरी

राह दिखलाने उन्हें, खुद की अगन में हम जलें फिर


बेंचने खुद को चलें फिर, एक दिन जीवन मिले फिर


- सर्वेश कुमार श्रीवास्तव