*दीपक*

ये छोटा सा दीपक, वो गहरा अंधेरा

निराशा का कोहरा या शंका का पहरा

नहीं छीन सकते वो सपना सुनहरा,

बवंडर का मौसम,अमावस की रातें

है संकरा सा रस्ता और उसपर भी कांटे,

ये हैं रोक सकते हतासों को केवल

जो लेती हैं सांसें उन लासों को केवल,

जो सच में है जीवित उसे है भरोसा

बीतेगी ये रातें और होगा सवेरा

ये छोटा सा दीपक वो गहरा अंधेरा

समेटेंगे मुट्ठी में सारी की सारी

जहां भी मिले रोशनी हमको प्यारी,

ये अदना सा दीपक भले है बेचारा

हमारे लिए चांद सूरज सा प्यारा,

इसी के सहारे अंधेरे कटेंगे

निराशा के उमड़े वो बादल छंटेगे,

है श्वासों में अग्नि तो जलता रहेगा

दिया एक हमने जो मन में उकेरा

ये छोटा सा दीपक वो गहरा अंधेरा

मुंदी आंख से भी प्रभा को निहारें

तमस अपने अंदर से सारा बुहारें,

सदा रोशनी का महोत्सव मनायें

विभा की विजय हो तमस को हरायें,

जगत प्रेम की रोशनी में नहाए

मेरा ही नहीं सबका घर जगमगाए,

घरौंदे में अगणित रखो चांद तारे

निशा कर दो जगमग,न जोहो सवेरा

ये छोटा सा दीपक वो गहरा अंधेरा

-सर्वेश कुमार श्रीवास्तव