उस अनजानी मोहब्बत का कोई नाम ढूंढते रहे,
तेरे गुलाबों के लिए उम्र भर एक किताब ढूंढते रहे
सफर में छोड़ा था उसने, मुझे लाकर दोराहे पर,
हम आजतक उसके कदमों के निशान ढूंढते रहे
बड़े घर बार कर मां बाप को बेघर बना डाला,
और कंकड़-पत्थर में भगवान ढूंढते रहे
गरीबी हंसती रही सड़क पर भी लेटकर,
महलवाले एक अदद मुस्कान ढूंढते रहे
थपकियां देती रही रात मुझको रात भर,
हम बिस्तर पर उसके निशान ढूंढते रहे
मोहब्बत खोजते थे, नफरतों की मंडियों में हम
बबूलों के शहर में एक गुलाब ढूंढते रहे
हमें जो शक्स हरदम अजनबी, अंजान कहता था
उसी अंजान में हम अपनी जान ढूंढते रहे
-सर्वेश कुमार श्रीवास्तव


