जो रक्त-स्वेद से नित अपने हर जीवन सबल बनाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं



वो कड़वी नीम की पत्ती से,सब घाव हमारे भरते हैं

कुछ भी करके सब इच्छाएं, बच्चों की पूरी करते हैं,

खुद कुर्ता छेदयुक्त वो पहन, हमको कपड़े दिलवाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं



कुछ अव्यक्त प्रेम और व्यक्त क्रोध

संचार रहित मन का विनोद

हम पर बस प्रेम बरसाया है ,पर कभी न उसे जताया है

चेतना शून्य उंगलियां पकड़,डगमग कदमों को चलाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं



त्यौहारों में बाजारों में, अंधेरे में उजियारों में

कभी मेवे हलवे पूड़ी में कभी रोटी और अंचारो में

हर संकट केवल उनका था,उल्लासों पर हक सबका था

कभी सख्ती से कभी नर्मी से हमको जीना सिखलाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं



बूढ़े बरगद की छांव से वो, जंगल के बीच एक गांव से वो

जो कठिन पहाड़ी चढ़ जाए, ऐसे फौलादी पांव से वो

मुश्किल में हमारे कंधों की जो ताकत खुद बन जाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं



घर के अंधेरे कोने में सबसे छुपकर के रोने में

आंसू भी हैं व्यवधान भी हैं, पर हम उनसे अंजान भी हैं

चुपके से रातों में अक्सर जो चादर उढा जाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं



संवाद पुत्र से कम करते पर फिक्र आठो पहर करते

साहस देते असफलता पर और छोटी-बडी सफलता पर,

जो मिठाई का डब्बा लाते हैं पर माता से खिलवाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं



जो मातु-पिता पद पूज लिए वो तीर्थ-धाम से हैं पवित्र

पितु की छाया पाते, नहाते माता की ममता के इत्र

बढ़ते-चढते, जीवन पथपे, आशीष जो इनका पाते हैं

वो जगदीश्वर ही इस जग में अपने पिता कहलाते हैं


... पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं‌