इक सूखा कुंआ गांव का उस पे सूना आंगन बिन छांव का,आंगन धोती हो जैसे ढलती शाम,खुशियों से दामन भर देते हो ये चांद सितारे,रात चुरा लीं हो खुबाबो ने फिर आयीं इक नयी सुबह सौगातों की,खुशियों का गला घोटकर मैंने अपनी प्यास बुझा ली है नंगे पांव पर चलकर मैंने जीवन की राह बना लीं है।