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खुबाब


साहिल पर बैठकर जब देखता हूं समन्दर को समन्दर की लहरें बार बार आकर और मुझे छूकर चलीं जाती हैं,मैं उनको पकड़ने की करता हूं कोशिश वो मेरे हाथ से फिसलकर मुठ्ठी रेत की भर जाती हैं।

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