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कर्म


अगर हमे अपनी प्रशंसा सुनना पसंद है तो हमें अपनी निन्दा भी सुननी होगी क्योंकि यह बात सत्य है कि हम अपने कर्मों निर्धारण स्वयं नहीं कर सकते।

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