गिरना है संभलना है और अभी गिर-गिर के संभालना है राह में आएंगे ना जाने कितने ही मोड अभी हमें राह में न जाने कितने ही मुसाफिरों से मिलना है चहरे पर लगें होंगे चहरे हर चेहरा अजीब होगा कौन अपना है और कौन पराया ये समझना बहुत ही मुश्किल होगा।