मेरे पांव के नीचे की मिट्टी खिसकती जा रही है कहां रोकूं मैं कदम ये शाम ढलती जा रही है सपने चुरा ले गयी हों रातै जैसे आंखें मलते मलते कोई दीख जाये अपना इस बेचैन सी भीड़ में।