Poetry 1 min read 787.5K reads

इंतजार


मेरे पांव के नीचे की मिट्टी खिसकती जा रही है कहां रोकूं मैं कदम ये शाम ढलती जा रही है सपने चुरा ले गयी हों रातै जैसे आंखें मलते मलते कोई दीख जाये अपना इस बेचैन सी भीड़ में।

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