एक बालक ने देखा था आज़ाद भारत का सपना ।
जिसे मान चूका था वह धर्म अपना ।
क्विक सिल्वर दिया था जिसे बिस्मिल से नाम ।
जो हरपल कर देता दुश्मन के मनसूबे नाकाम ।
वो था भारत माँ का सपूत और आज़ाद था उसका नाम ।।
बाल सुलभ क्रीड़ा से हट कर जिसका काम निराला था ।
देश की आज़ादी और राष्ट्र धर्म को जिसने खेल बनाया था ।
सौ कोड़े खा कर भी जिसके मुख से नहीं निकली एक आह ।
कहता रहा वो हरपल फिर भी भारत है माता का नाम और आज़ादी पिता का नाम ।
वह था भारत माँ का सपूत और आज़ाद था उसका नाम ।।
बिस्मिल से मिलकर जिसने काकोरी को लूटा था।
अंग्रेजी शासन का सूरज उस शाम पहली बार डूबा था ।
अँग्रेज़ोन से पकड़ा जाना जिसके लिए था अपमान ।
आज़ाद था आज़ाद रहेगा कह के त्याग दिया संसार ।
वह था भारत माँ का सपूत और आज़ाद था उसका नाम ।।
- सार्थक बनर्जी


