तुम्हे........
मैं जो कभी......
न मिलूं तो गम न करना माना,
तुमको अज़ीयत होगी तुमसे रुबरु मेरी हकीक़त होगी
ये जिस्म जो फ़ानी है
बे-मुरव्वत ज़िन्दगी की नामुराद कहानी है तब .......
तुम्हे .........
मैं उन्ही किताबों में मिलूंगी जहाँ..........
तुमसे लबरेज़ मेरे लफ्ज़ नज्मों की शक्ल में सांस लेते हैं
लफ़्ज़ों से गुफ्तगू करते-करते
जो तुम्हे नींद आ जाए तो
अपने सीने पर किताब रख सो जाना तुम पाओगे कि,
इससे करीबतर हम और तुम कभी और कहीं रहे ही नहीं !
बस इत्ती सी है मेरी वसीयत !!