प्रिये तुम्हारी देहरी पर रख आया हूँ मैं दीप अधजला
जागो तो थोड़ी सी उसमें लौ भर देना हाथ लगाकर
और बचे जब उसमें थोड़ी बाती अंत समय पौनी सी
तुम लेना तब नाम स्वयं से प्रेम कहे बिन थोड़ा उजला
देखो उस कच्ची मिट्टी में काजल छोड़ गई है बाती
सुनो प्रिये तुम उस काजल को कानों के पीछे रख लेना
अम्मा ने इक बार किया था नजर उतारा नाम दिया था
मेरी आँखों से ना यूं हो, सो पहले हूँ इससे सम्भला
करबद्धों के बीच लिए थे मैंने हाथ पुष्प थोड़े से
जूही के दो चार मिले थे झुमके धागों से जोड़े थे
कुम्भालने से पहले आओ कानों की इन वल्लरियों में
हौले से धर लो मुस्काओ, प्रेम तुम्हीं हो पहला-पहला
ना जाने कितनी ही घड़ियाँ मैंने तुम से माँग रखी हैं
अचरज की सीमा के ऊपर अर्गनियों में टाँग रखी हैं
सोच रहा बरखा हो जाए, थोड़ी-थोड़ी सब भीगेंगी
उस बरखा दीपक भीगेगा देहरी पर बैठा है पगला।।
अंकित


