लोग जा रहे हैं/जाने वालों के नाम एक कविता
लोग जा रहे हैं
जैसे चली जा रही है मुट्ठी से रेत
हवा की दिशा में बिखरती,
लोग जा रहे हैं
जैसे मृत्यु के बाद जा रही है याद
कि अब कभी टकराएंगे
शहरों की भीड़ में चलते हुए,
नज़रों से छूते हुए,
गुजरने की गति से तेज,
लोग जा रहे हैं
जैसे चली जाती है धूप
साँझ के आग़ोश में सिमट कर
छोड़ती हुई चुटकी भर रोशनी
छुटपुट सितारों के नाम,
लोग जा रहे हैं
कि जैसे सीज़नल पौधों सेविदा ले रहे हैं फूल,
जड़ें माटी करते हुए मानो कह रहे हैं
कुवँर नारायण की कविता में -
"अबकी बार लौटा तो
बृहत्तर लौटूँगा"
लोग जा रहे हैं
जैसे चली जा रही है भीड़किसी यात्रा की, कामगीरों की
वैष्णव भक्तों की, जत्थों की
फुटपाथों पर सोए मँगइयों की
भेड़ों के झुण्डों की, रेगिस्तानी ऊँटों की
हिमालय चढ़ते वीरों की
बंजारों की, यारों की, सैयारों की
वोटरों की, चीटरों की
राजनीतिक परिवेश में फैले सभी लीडरों की
गुस्से में तमतमाए मनरंजित अधीरों की
लोग जा रहे हैं,
लोग जा रहे हैं
जैसे जाते हैं खिसियाए फूफा
फुफकार कर, दुत्कार कर
गरियाते, बुदबुदाते
कि अब लौटना मुश्किल है,
लोग जा रहे हैं
जैसे जा रहे हैं मजदूरों के बच्चे स्कूल,
पहने फटी एड़ी की चप्पल,
कि उनके हिस्से की याद की परिभाषा में
लड़ाई शब्द वीभत्सता का बनेगा पर्याय,
लोग जा रहे हैं
जैसे कहानियों में चले जाते हैं
भाई, दोस्त, अम्मा, बाबा और कोई बैल,
जिनकी पूछ परख के बिना नहीं होती कहानी पूरी
कि लौटना उनका वहाँ नामुमकिन होता है,
मानो कहानी का नायक ले चुका हो विदा,
लोग जा रहे हैं ऐसे
जैसे चले गए थे उस रोज चिट्ठी में बैठ कर
अंत्योष्टि की खबर में बुढ़ऊ,
कि द्वितीया को उठावना,
नवमी को दशगात्र,
और तेरवीं है द्वादशी को,
लोग जा रहे हैं
जैसे प्रेम पत्रों के आखिरी कोने में
सिमट कर चला गया था मन
और लौटा नहीं शहर छोड़ने के बाद भी,
लोग जा रहे हैं
लोगों का जाना अनंत रूपों में लगा रहता है
जिसे देख कहते हैं केदारनाथ
"मैं जा रही हूँ – उसने कहा
जाओ – मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि जाना
हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।"
अंकित
केदारनाथ जी और कुँवर नारायण जी से क्षमा याचना के साथ क्योंकि उनके बिना यह कविता पूरी नहीं होती।।

