ज़िंदगी कब,कहा
और कैसे?
बदल जाती हैं ऐसे,
कि करवट लेती हैं
तो पता नहीं लगने देती।
कर देती है अपने थपेड़ों से
इन्सान को
मज़बूत ऐसे,
कि भारी तूफ़ानो से भी
फिर उसे
सरसराहत नहीं होती।
यूँ तो ठहराव आते हैं
हर तूफ़ान के बाद लेकिन
फिर भी क्यूँ ,
हर इंसान के चेहरे पे
मुस्कुराहट नहीं होती।
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डा.सरिता डांगी
