विकल्प
….उसके पास
कोई विकल्प नहीं था
वो तो इस बात से भी बहुत हैरान थी
कि डाक्टर होकर
उससे अपनी ही बीमारी
क्यूँ नहीं पकड़ी गई?
क्यों इतनी भाग दौड़ करती रही ?
रोती रही…
पूरे एक महीने
उसने किसी से बात नहीं की
पत्थर सी हो गई थी वो ….
जैसे ….अब वो जीना ही
नहीं चाहती हो
कीमोथेरेपी के सिवाय
उसके पास अब कोई विकल्प ही नहीं था…
वो रोते-रोते भी
बस यही सोचती रही
कि कही उसके बच्चों को ये बीमारी
आगे पास ना हो जाए ….
कैंसर हैं ही ऐसा …वो सोचती रही
अचानक वो ..ज़ोर से चिल्लायी
सिर पर
एक भी बाल भी नहीं था …सब झड़ चुके थे
उसे ग़ुरूर था अपने लंबे बालों पर …
कीमोथेरेपी ने उसके बाल ही नहीं
उसका सारा ग़ुरूर छीन लिया
रोते -रोते शायद आँख लग गई
या फिर आँख खुलते ही रोने लगी
वो ख़ुद भी नहीं जानती थी
कि क्या हो रहा हैं ?
सपना था शायद …या सपने जैसा था शायद ?
वो पूरी पसीने में तर थी
और पास में एक किताब थी
जिस पर लिखा था ….”विकल्प”
सरिता डांगी
