बहुत से प्रश्नो को

दबा के सोती हूँ।

कहाँ मिलेंगे जवाब

इसका हिसाब,

लगा के सोतीं हूँ।

क्यूँ बढ़ गए है प्रश्न

अचानक मेरे

इस महामारी के जैसे,

इस सब का 

विचार लगा सोती हूँ।

इसी कश्मकश में 

सुबह हो जाती हैं।

और फिर प्रश्न उठता है,

क्या मै सचमुच सोती हूँ?


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डा सरिता डांगी✍️✍️