पिताजी की अलमारी से

पुरानी किताब में

एक पर्ची निकली

लिखा था “मेरी प्यारी डॉक्टर बिटिया, 

जब वक़्त लगे 

इस पुस्तक को पढ़ लेना।

वो, जो मैंने कभी 

पढ़ी ही नहीं थी

वक़्त के अभाव में।

छिपा दी थी वापिस 

पिताजी की अलमारी में 

आज वक़्त है, 

किताब भी पढ़ ली

पर पिताजी नहीं है।

इस पर्ची में 

पिता की भावनाएँ ही नहीं

पुस्तक का भावुक 

सारांश भी स्पष्ट है।

वो पुस्तक जो

पिताजी ने कभी लिखी थी 

उस संघर्ष और मेहनत पर 

जो कभी मुझे 

डॉक्टर बनाने पर की थी।


डॉ. सरिता डांगी✍️✍️