सुना है, परिस्थियाँ आज बेक़ाबू है
पर तुम क्यूँ
परिस्थिति बन बैठे।
समय तो बदलेगा,
समय है आख़िर
पर तुम क्यूँ इतना बदल बैठे?
घर बनाया था हमने
मिलके जो,
आज उसको क्यूँ तुम जला बैठे?
ख़ुश रहो दुनिया में
अपनी तुम,
पर मुझको क्यूँ तुम रुला बैठे?
याद रखते हो बस,संघर्ष अपना
त्याग् मेरे क्यूँ तुम भुला बैठे?
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डा.सरिता डांगी✍️✍️
