मुझे 

तुम्हारे सीने पर सिर रखकर 

वो धड़कनें सुननी है 

जो कभी,

मेरे लिए धड़की थी

मुझे तुम्हारे

उन हाथों को छू कर 

महसूस करना है,

जिन्होंने इस बावरी को 

इतनी सादगी से 

अपनी कविताओं में 

रचकर ख़ूबसूरत बना डाला।


मुझे उन आँखो में झांकना है 

जिनमें धुंधली ही सही 

मगर कही ना कही

मेरी तस्वीर हुआ करती है।


मुझे उस माथे को चूमना है 

जो बड़ी पाकीज़गी से

हमेशा ही मेरे सजदें में रहा…


मुझे उन पावों को छूना है 

जो मेरी तरफ़ जब भी बढ़े 

बिना किसी उम्मीद के,

बिना किसी स्वार्थ के बढ़े…


हाँ …मुझे तुम्हें

कसके गले लगाना है 

जिसने कभी मुझे ‘गंगाजल’

तो कभी ‘ज़िंदगी’कहकर 

मुझे एक ही जन्म में 

ना जाने 

कितनी बार ज़िंदगी दे डाली

और ख़ुद को 

मेरे लिए ख़ुदा बना लिया। 

हाँ …तुम

ख़ुदा हो मेरे …”मेरे तुम”



सरिता डांगी #सरूँ