आज फिर मैंने
काग़ज़ों से
खिलवाड़ कर डाला।
कलम ले ली हाथ में,
बस कुछ भी लिख डाला।
क्या सचमुच यें ‘कुछ भी’
मेरा हिस्सा नही?
या मेरा अतीत नही?
या रोज़मर्रा का होने
वाला व्यतीत नही?
या बस मेरा बहम है।
या फिर महज़ कल्पना
कैसे लिख सकती हूँ
मै कुछ भी?
नही,ये सत्य नही पर
ये जो भी है,
मेरी साँस चलने का
एहसास है।
आज फिर मैंने
काग़ज़ों से
खिलवाड़ कर डाला
बस कुछ भी लिख डाला
डा सरिता डांगी✍️✍️


