…

और एक दिन

बहा दिया उसने

एक प्रेम …एक रिश्ता

अपनी आँखों के कोरों से

और …कोरे छोड़ दिये

कुछ एहसास,

जिन पर एक नहीं

बल्कि …सैंकड़ों

नज़्मों का हक़ था…


जो नज़्म लिखी गई …वो …बिखेर दी

जो नहीं लिखी…वो तड़पती रही

और जो अधूरी रही …वो भटकती रही

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डा.सरिता डांगी #सरूँ