
बीज बनकर आई थी कोख में
वक्त बीत गया यूं ही कष्ट में
जन्म लेकर आ गई गोद में
नन्ही सी गुड़िया स्वर्णिम वो लम्हे
गुलाबी गुलाबी समा हुआ था
नाजुक हाथो के छुअन से तेरे
मन का आँगन खिल उठा था मेरा
मेरे बगिया के फुल बनकर तु आई
खुशियों की दुनिया आकर बसा दी
रौनक बनकर जीना सीखा दी
तू खुशबू है इस बगिया की
तू नूर है मेरी दुनिया की
वक्त का पहिया यूं ही घूमता गया
समय का घोड़ा दौड़ता गया
आज तू कितनी बड़ी हो चली है
उड़ान भड़ने को पर फड़फड़ाने चली है
तेरे पास होने पर कुछ आभास नहीं होता
दूर जाने पर याद तेरी आती है
आजा तुझे प्यार से चूम लूँ
बाहों की डाली मे तुझको झुला लूँ
तेरी नजरे उतारूँ तुझको संवारु
इन थोड़े से लम्हों को सबसे चुरा लूँ
तुझे प्यार देकर खुद को जोड़ लूँ
नन्ही सी प्यारी सी कोमल सी गुड़िया
कोयलिया
....................
कुहु कुहु करती हूँ सुनसान गलियों मे
मन रमाती हूँ वियावान गलियों मे
रस राग समझने वाला कोई चाहिए
बार बार खो जाती हूँ अंजान गलियों में
अंबिया की खुशबू मुझे लुभाती है
फिर लोट आती हूँ उन्ही सुनसान गलियों में
रस भरने के इंतजार मे टकटकी लगाए बैठी हूँ
कुहु कुहु राग सुनाती हूँ इन अंजान गलियों मे
रस स्वाद महसूस कर इतराती हूँ
बार बार सुर लगाती हूँ इन बेनाम गलियों में
खुद को बचाकर नजरों से छुपाकर
गुंजायमान करती हूँ इन बेजान गलियों मे
धरा
...............
क्यो क्रोधित है धरा
क्या तेरा जी भर आया है
है दर्द जख्म तेरे सिने मे भरा
क्या सह सह कर तेरा कलेजा भर आया है
जब पुत ही कपूत हो जाते है
माँ का सीना ऐसे ही थर्राता है
है आतताइयों से तेरा आँचल जरजर
पुत्र प्रेम है जो तुझको भरमाया है
न दिख रहा है इन नीरलज्जों को तेरा अश्रु
ये तो स्वार्थी है स्वार्थ के पुजारी है
व्यर्थ के दर्द तेरे सिने मे उकरी है
मचा रखा है आतंक आंतकी हरकत
अपनी हरकत से माँ का सीना किया जर जर
ऐसा लगता है ये दर्द तेरे सह मे नहीं
तभी तू इतनी क्रोधित है धरा
तेरा सीना तभी थर्राया है
है दूर अश्रु अब तो
दर्द अब तेरा उभर आया है
क्यो क्रोधित है धरा
क्या तेरा जी भर आया है ।
………………………………………………………………………
क्या कसुर था
......................
क्या कसुर था मेरा की बेघर हुए
दुनिया मे आने से पहले खत्म किए गए
बीज पड़ने से पहले ही बिखर गए
नाम आते ही मेरा जहां मुझसे डर गए
कैसी रचना उसके द्वारा हम रचे गए
नाम आते ही मेरा सब सहम गए
सोचती हूँ किसके द्वार जाऊँ मै
जहां इसको जीवन और मान मिले
ऐसा न हो उस रचयिता के रचना का अंत हो जाए
तिरस्कार और अनादर तले खो जाए
संभालो मुझको जुगनू की तरह खूबसूरत हूँ मै
उस रचयिता की सुंदर रचना हूँ मै
घर घर के लिए एक दुआ हूँ मै
सवार दे घर संसार को ऐसी रचना हूँ मै
दुआओ मे जब किसी ने हाथ उठाए होंगे
वर रूप मे मिला हुआ एक वरदान हूँ मै
इस पृथ्वी की अनमोल रचना हूँ मै
खुशियों के फूलों से भरा एक गुलिस्ता हूँ मै । 4
.............................................................................
आज भी वह मंजर याद आता है
लोगों की सिसकियाँ उनकी चीत्कार
बवंडर से भरा वह दृस्य
आज कलेजा दहला जाता है
सोई दुनिया जागी सवेरा हुआ
पर कहीं किसी के घर में अंधेरा हुआ
माँ बाप तो कहीं बच्चे
एक दूसरे से जुदा हुए
सोच सोच वो दृस्य दिल घबराता है
आज भी वो मंजर याद आता है
आकाश मे तारे आज भी टिमटिमाते है
आज भी किसी की आंखों में टकटकी लगी है
अपनों के इंतजार मे आज भी खड़ा है
चित्कार की आवाज आज भी सहमा जाता है
आज भी वह मंजर याद आता है
कही लाशों की ढेर कही मलवों की ढेर
मलवों मे दबी जीने की लालसा भड़ी आंखे
सो गई चीड़ निद्रा में इंतजार करते करते
आज भी वो मंजर याद आता है
आस्था की चाह आज भी जगमग है
दहसत है दिल में फिर भी लोग जाते हैं
उस शिव के भरोसे अपनी नैया सोंप कर
उनके चरणों मे आज भी शीश झुकाते हैं
आज भी वो मंजर याद आता है ।
………………………………………………………………………
औरत
................................................
एक औरत के लिए
आकाश को छुना
इतना आसान नहीं होता
अपने सपनों को
साकार करना
इतना आसान नहीं होता
अपने संसार का भार
सिर पर लिए हुए
सारे दुख सुख को
झेलते हुए
अपने सपनों को
रूप देती है वो
इतना आसान नहीं होता
परिवार समाज के
रंग बिरंगे कटीले
शब्दों को झेलकर
साहस और हिम्मत को
अपना ढाल बनाकर
निरंतर चलती है वो
अपनी अभिलाषाओं को
पूरा करती है वो
इतना आसान नहीं होता
अपनी दर्द को अंदेखाकर
सबकी मरहम बनती है वो
सारे आक्रोशों को
सहती है वो
फिर जाकर कुछ
बनती है वो
इतना आसान नहीं होता
सिर पर अपने कई
जिम्मेदारियाँ उठाती हुई
भले बोझ तले
क्यों न दबी रहे वो
फिर भी उफ नहीं करती है वो
तभी तो वीरांगना
कहलाती है वो
दुर्गा सरस्वती लक्छ्मि
का रूप लिए हुए
निरंतर चलती है वो
इतना आसान नहीं होता
कहीं माँ कहीं बेटी
कही बहु तो कहीं अर्धांगिनी
कही बहन कहीं सच्ची सलहकारिणी
बनकर पग पग पर
चलती है वो
तभी तो एक दिन
महारानी लक्छ्मि बाई बनती है वो
इतना आसान नहीं होता
.................................................................................
औरत
..................
ईश्वर इस जहां मे
खुद को तन्हा पाया होगा
तभी औरत को बनाया होगा
वो औरत ही है जो
नौ महीने एक बीज को
उदर मे अपने सँजोती है
लालन पालन कर उनको
एक इंसान का रूप देती है
रोते बिलखते बच्चों को
अपनी ममता का सहारा देती है
उठते गिरते लरखराते कदम को
अपनी प्यार व अंगुली का सहारा देती है
पग पग पर सहारा देकर
अपनी छुअन से से सारे दुख हर लेती है
वो औरत ही है जो
योग्यता शिक्छा और संस्कारों
से सुसज्जित कर एक
सुगठित इंसान का निर्माण करती है
अपने ममता के छांव तले
बड़े नाजो से पाल पोष कर
इस लायक बना देती है
जो अपने योग्यता और संस्कारों के बल पर
एक सभ्य सुगठित परिवार समाज
तथा देश का निर्माण कर सके
वो औरत ही है जो संसार की निर्मात्री है
तभी तो ईश्वर भी इस जहां मे
जब खुद को तन्हा पाया होगा
तभी तो औरत को बनाया होगा ।
राजनीति
आज कल राजनीति की हवा बह रही है
इलैक्शन का मौसम चल रहा है
सभी प्रत्याशी अपने-अपने हथकंडे लेकर
राजनीति के अखाड़े मे उतर गए हैं
जो पहले से नेता थे वो तो है ही
उनके रिस्ते नाते भी मैदान मे कुद पड़े हैं
परिवार का माहौल ही राजनीति भड़ा है
अपने अपने हाथों में चिन्ह लिए खड़े है
संतान तो संतान नई नवेली दुल्हन को भी
मैदान में खिच खड़े किए है
अपने अपनों से दूर हो गए है
जो दुश्मन था वो दोस्त बन गए हैं
अपने अपनों को अपनी ओर खिच रहे है
पर अपने ही अपनों से दूर भाग रहे हैं
जो कुर्सी पर पहले से बैठा है
कुर्सी बचाने के लिए और और कर रहा है
सच मे प्यार क्या है
तेरे साथ होने का वो एहसास
या तेरे दूर जाने का गम
वो अधूरापन तेरे बिन
साथ तेरे पूर्णता का वो एहसास
वो आने से तेरे
मौसमे बहारों का आना
तेरा साथ गर हो
हर मौसम है सुहाना
पाकर तुझे जैसे
सारा जहाँ मिल गया हो
इस धरा को जैसे
आसमा मिल गया हो
सजाकर रखना है तुझे
दिल के आशियाने में
तुम्ही वो खुशबू हो
जो जीवन को महका रही है
तेरे होने से ही
जीने की आश भी है
वरना रक्खा है क्या
इस जहाँ मे तुझ बिन
वीराना है उदासी है
इसके सिवा क्या है
प्रेम हो तो जीवन है
खुशियाँ उमंग है और सरगम है
तेरा साथ हो तभी तो जीवन है
जब से जुदा मै तुझसे हुआ हूँ
विरह की अग्नि में जब से जला हूँ
तभी से समझा हूँ
सच में प्यार क्या है
आज धरती पर छाई हरियाली है
और अंबर हुआ है केसरिया
श्वेत रंग हर दिल में बसा है
आया शुभ घड़ी आया
आओ स्वतंत्रता दिवस मनाए
प्राणों से प्यारा तिरंगा फहराए
भुलकर भेद भाव को हम सब
समय चक्र में लिपटा भारत
उथल – पुथल को झेल रहा है
फिर भी कैसे संभल – संभलकर
हर पग – पग पर चल रहा है
अद्भुत देश वाशी है अद्भुत
सब्र बाँध को न खोकर यह
फुक – फुक कर कदम – कदम पर
अडिग खड़ा है यह स्व पथ पर
बाँधकर, मुट्ठी एकत्व का
अपने भारत को जोड़े खड़ा है
सदा रहना यूँ ही अविचल तू
तूफानों से मत घबड़ाना
उथल – पुथल से मत डर जाना
कभी किसी बहकावे में आकर
अपनी हस्ती को नहीं मिटाना
दिखाकर ताकत, अपनी एकता का
दुर्जनों को धूल चटाना
आया देखो शुभ घड़ी है आया
भुलकर सारे गीले – शिकवे को
देश भक्ति के रंग, रंग जाएँ
मिलजुल कर सब प्रेम भाव से
राष्ट्रीय पर्व का जश्न मनाएँ
क्योंकि
आज धरती पर छाई हरियाली है
और अम्बर हुआ है केसरिया
आया शुभ घड़ी आया
आओ स्वतंत्रता दिवस मनाएँ
आँखों का तारा तिरंगा लहराएँ
अटल जी
जो अटल रहे अपने पथ पर
विलक्षण प्रतिभाओं के धनी
जो देश के खातिर न्योछावर
उनका हर कर्म उनका हर धर्म
थे अद्भुत प्रतिभावान पुरुष
सिने मे जिनके धड़कते थे
देश भक्ति की एक - एक धड़कन
झुकने न दिया अंतिम श्वास तक
शान से लहराता, राष्ट्र ध्वज
जो अटल रहे अपने पथ पर
जीवन के अंत समय तक
जन – जन के आँखों का तारा
नेता वो जन – जन का प्यारा
थे हर दिल में बसने वाले
चाहे हो पक्ष या हो विपक्ष
जिनकी कलमें सदा उगलती थी
स्वदेश प्रेम की गाथाएँ
शब्द लहरी लहराती थी
जिनके शब्दों में हर क्षण
ऐसे पथ पर अटल नेता को अर्पित
देश का
अंजलि भर कर श्रद्धा सुमन
सरिता प्रसाद
970 × 545
