अमन व शांति
न छेड़ो, अमन और शांति को
वतन में बरकरार रहने दो
न तेरा है न मेरा है
इन्हें सजाकर रखना है
बड़े नाजों से सींचा है
वतन के, रखवालों ने
छोड़कर राग द्वेष के पंथ
प्रेम का फूल खिलने दो
न छेड़ो यूँ दिलों के तार को
के कर्कश न बन जाए
सुरीली सरगमों को
बाग में अपने लहड़ाने दो
धर्म और जाति के नाम पर
छोड़ो आपस में लड़वाना
मजहब के नाम पर छोड़ो
इन्हे आपस में भीड़वाना
यह कैसी राजनीति है
यह कैसी कूटनीति है
न तो यह नीति कहती है
न ही यह धर्म कहता है
रोक लो इन बाजुओं को
के अब उठने, न दो इनको
हाथ से हाथ मिलने दो
इनमे नफरत, न पलने दो
न छेड़ो, अमन और शांति को
वतन में बरकरार रहने दो ।
सरिता प्रसाद


