
अमन व शांति
न छेड़ो, अमन और शांति को
वतन में बरकरार रहने दो
न तेरा है न मेरा है
इन्हें सजाकर रखना है
बड़े नाजों से सींचा है
वतन के, रखवालों ने
छोड़कर राग द्वेष के पंथ
प्रेम का फूल खिलने दो
न छेड़ो यूँ दिलों के तार को
के कर्कश न बन जाए
सुरीली सरगमों को
बाग में अपने लहड़ाने दो
धर्म और जाति के नाम पर
छोड़ो आपस में लड़वाना
मजहब के नाम पर छोड़ो
इन्हे आपस में भीड़वाना
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