सोच नहीं बस चल पड़ तू

चला चले औे चला चले तू

नियति नहीं कुछ नहीं विधान

कर्म ही तेरी अटल पहचान

देख सवेरा होने को है

तम निशा का सोने को है

बजा शंख,कर अदा अज़ान

बांध ले मुट्ठी प्रण ले ठान

खोल बेड़ियां तोड़ दे बंधन

अपनी शक्ति को तू जान

ख़ुद ही बन जा ख़ुदा किसी का

दर दर ढूंढ रहा इंसान

लगा किनारे कश्ती को अब 

आने दे आंधी तूफ़ान

साहस तेरा चूमे गगन को

धीर से लजा गया हिमांचल

इस सच को क्यों झुठलाता है

नए क्षितिज तय करने को

निकल रास्ता तुझे बुलाता है