स्मरण है , वह दिवस , तू आई
अंबर की नीलिमा साथ लाई
मानों सागर समा गया हो
तेरे वसनों में ॥
उदधि की ऊर्मि कर धारण
तू लहराती आई पवन संग
देखी थी आनंद की तरंग
तब तेरे नयनों में॥
दिनकर , कर पृथ्वी को विदा
जा रहा था , पर कुछ अरुणिमा
तुझे सौंप गया , कहकर ,
रात्रि में तू ही आभा फैला!
दिनकर तब हो रहा था अस्त
अपनी कुछ अरुणिमा को न्यस्त
करके तुझमें, हो गया लुप्त
आलोकित मुख की आभा गुप्त !
