शाम के ढलते उजाले में,
अजीब सी आहट सुन रहा हूं में।
किर किर करते झींगुर से,
मधुर सा गीत पिरोह रहा हूं में।
ढलती शाम नज़ारों में,
पेड़ों को बात सुना रहा हूं में।
तेरी मेरी बातों का,
गुमसुम सा गीत सुना रहा हूं में।
चलते चलते खाव्बों में,
खुद से सवाल उठा रहा हूं में।
ढलते शाम के उजाले में,
जीवन की दौड़ लगा रहा हूं में।
ढलती शाम नज़ारों में,
जीवन का राग सुना रहा हूं में।