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तृप्ति


कृष्ण ने चावल का एक दाना खा करभर दिया था सम्पूर्ण संसार का मन,मेरे भी हिस्से आया तुम्हारे प्रेम काएक तिनका, मेरा भी संसार बसइसी तिनके से तृप्त है.....

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