एक प्रथा मैं हर साल निभाता हूं

पहली बारिश मैं खुद को भीगाता हूं।

वही जून का माहा, पहला हफ्ता होता है।

वही सड़क, वही रास्ता होता है।

लेकिन प्रथा मैं कुछ कमी सी है।

तेरे ना होने से बारिश भी अधूरी सी है।

इस साल भी तेरे बिना प्रथा निभाए हैं।

उसी मोड पर बारिश आई है

लेकिन बूंदे इस बार भी मन नहीं छू पाई।

बरसात ने फिर तेरी याद दिलायी।

लेकिन प्रथा मैंने फिर भी निभायी।