कवि : शरद अल्फाज़ी


मैं जानता हूँ !

तुममें पहुँचकर मैं जल जाऊँगा, 

तुम्हारी अनल के ताप से

या प्रेम की गरमाहट से ।


किन्तु मैं कैसे मार पाऊँ 

मुझमें पैदा हुई जिज्ञासा को

बिना तुम्हें देखे 

बिना तुम्हें स्पर्श किए

बिना तुममें जले ।


तुममें जलकर ही

मेरी नम्यता का पुनर्जन्म होगा

और मेरा भी ।


   ~ शरद अल्फाज़ी