मुझे जलना पसन्द आया

चूल्हे में पड़ी रोटी होकर नहीं

जंगल की घास होकर नहीं

बल्कि बांस होकर


मैं खोखला होकर जलुँगा

और भर-भरकर चीखूँगा ।


मैं चाहता तो रोटी होकर जलता

किन्तु फेंक दिया जाता


मैं चाहता तो घास होकर जलता

किन्तु राख हो जाता


मैं बांस होकर जला

और कोयला बना


मुझे मेरे बाद भी उपयोग किया जाए

और एक बार फिर जलाया जाए ।


- शरद अल्फाज़ी