Poetry 1 min read 626.5K reads

बस यही


मैं चाहता हूँमेरे जीवित रहने तकमुझे जीवित रखा जाएजैसे पेड़ को पेड़ रखा जाता हैलकड़ी बनने तक ।

— शरद अल्फाज़ी
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